पूर्व फ़ेसबुक कर्मचारियों ने कहा भारत सरकार के दबाव के चलते फ़ेसबुक ने अपनी मानवाधिकार रिपोर्ट से नफ़रत फैलाने में बीजेपी की भूमिका का ज़िक्र हटाया - IAMC

पूर्व फ़ेसबुक कर्मचारियों ने कहा भारत सरकार के दबाव के चलते फ़ेसबुक ने अपनी मानवाधिकार रिपोर्ट से नफ़रत फैलाने में बीजेपी की भूमिका का ज़िक्र हटाया

FOR IMMEDIATE RELEASE / प्रकाशनार्थ

वाशिंगटन डी.सी. (जुलाई 29, 2022) – दुनिया भर में नफ़रत फैलाने में फ़ेसबुक की भूमिका का पर्दाफ़ाश करने वाली दो पूर्व कर्मचारियों ने फ़ेसबुक चलाने वाली कंपनी मेटा की पहली मानवाधिकार रिपोर्ट की जम कर निंदा की है क्योंकि इस रिपोर्ट में भारत में नफ़रत फैलाने में फ़ेसबुक की और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका का ज़िक्र तक नहीं है.

इन पूर्व कर्मचारियों ने कहा है भारत सरकार के दबाव में मेटा ने अपनी रिपोर्ट से ये बात गोल कर दी है कि बीजेपी से जुड़े लोग, जिनमें सांसद भी हैं, नफ़रत भरे एकाउंट्स चलाते हैं और फ़ेसबुक जानबूझकर उनके ख़िलाफ़ एक्शन नहीं लेता है.

चौदह जुलाई को मेटा ने अपनी पहली वैश्विक मानवाधिकार प्रभाव आकलन (Human Rights Impact Assessment) रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में मेटा ने दावा किया है कि वो दुनिया भर में मानवाधिकार सुरक्षित करने के लिए भरपूर कदम उठाती है और नफ़रत भरे एकाउंट्स और पोस्टों के ख़िलाफ़ लगातार कार्रवाई करती है.

लेकिन फ़्रांसेस हॉगेन और सोफी ज़ैंग नाम की इन पूर्व कर्मचारियों ने मेटा के दावे को झूठा बताते हुए आरोप लगाया कि मेटा मुनाफ़े को प्राथमिकता देती है और नफ़रत से लड़ने कोशिश नहीं करती है बल्कि नफ़रत को बढ़ावा देती है.

इस सप्ताह अमेरिका में अट्ठारह मानवाधिकार संगठनों द्वारा आयोजित एक संसदीय ब्रीफ़िंग में हॉगेन ने कहा, “मेटा की रिपोर्ट दावा करती है कि कंपनी ने निरीक्षण बोर्ड बनाए हैं जहाँ लोग अपील कर सकते हैं, और कंपनी पूरी पारदर्शिता के साथ काम करती है. लेकिन सच्चाई ये है कि इस बाबत बुनियादी डाटा देने तक को मेटा तैयार नहीं है कि अलग-अलग भाषाओं में उसने कौन से मॉडरेशन सिस्टम लगाए हैं और उनका प्रदर्शन कैसा रहा है.”

पिछले दो सालों में हॉगेन और ज़ैंग ने खुलेआम ये आरोप लगाया था कि फ़ेसबुक पूरी दुनिया में नफ़रत को बढ़ावा देता है और तानाशाह सरकारों का साथ देता है. उनके इन दावों के चलते फ़ेसबुक ने दोनों को नौकरी से निकाल दिया था.

अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (US Securities & Exchange Commission) के साथ हॉगेन ने पिछले साल फ़ेसबुक के हज़ारों दस्तावेज साझा किए थे जिसके बाद वो रातोंरात अंतरराष्ट्रीय सेलेब्रिटी बन गई थीं.

मानवाधिकारों की रक्षा करने और नफ़रत को रोकने के मेटा के दावों को खारिज करते हुए हॉगेन ने कहा फ़ेसबुक ने कंटेंट मॉडरेशन — यानी पोस्टों पर नज़र रखने और नफ़रत वाली पोस्टों को हटाने की क़वायद — के लिए न्यूनतम निवेश किया है. “एक्टिविस्टों की पोस्टें हटाई जा रही हैं. लेकिन हम यह भी नहीं देख सकते हैं कि ये सिस्टम कैसे काम करता है.”

हॉगेन ने कहा मेटा की रिपोर्ट अमेरिका को हाईलाइट करती है मगर अमेरिका में “फ़ेसबुक का सबसे साफ-सुथरा संस्करण है जबकि ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषाओं के कंटेंट पर फ़ेसबुक कम नज़र रखता है और ख़र्च भी कम करता है.”

फ़ेसबुक में प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में काम कर चुकी हॉगेन ने बताया कि कलह और फ़साद वाले देशों में फ़ेसबुक ने जब -जब सबसे ज़्यादा शेयर होने वाली पोस्टों जांच की तो पाया कि उनमें भयानक हिंसा, जैसे कटे हुए सिर, होते थे.

हॉगेन ने कहा “हम आपस में चर्चा करते थे कि ऐसा कैसे हो रहा है? इन्हें इतना प्रसार क्यों मिल रहा है? दरअसल फ़ेसबुक का डिज़ाइन ही ऐसा है कि भड़काऊ पोस्टें ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचती हैं. फ़ेसबुक का अल्गोरिथ्म मूलतः बहुसंख्यकवादी है.” जिन पोस्टों को ज़्यादा लोग लाइक और शेयर करते हैं “उनका ज़्यादा प्रसार होता है.” हॉगेन ने कहा, “बग़ैर फ़ेसबुक के सक्रिय सहयोग के मानवाधिकारों की सुरक्षा पर विचार-विमर्श नहीं हो सकता है.”

फ़र्ज़ी पोस्टों का मुकाबला करने में फ़ेसबुक की विफलता उजागर करने पर 2020 में डाटा साइंटिस्ट के पद से बर्ख़ास्त की जाने वाली सोफ़ी ज़ैंग ने कहा फ़ेसबुक के काम में दुनिया भर में “सबसे ज़्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप” भारत में होता है. और पूरी दुनिया में जिस सरकार के सामने फ़ेसबुक सबसे ज़्यादा झुकता है वो भारत है. उसकी वजह ये है कि भारत सरकार फ़ेसबुक के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को हमेशा तत्पर रहती है और जनता की ओर से फ़ेसबुक को समर्थन नहीं मिलता है.

ज़ैंग ने कहा “नफ़रत के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करना ही फ़ेसबुक का तानाशाहों को तोहफ़ा है. फ़ेसबुक सत्ताधारी का साथ देता है. जो फ़ेसबुक पर दबाव बना कर उसे सही करने के लिए सशक्त हैं वो ऐसा करना नहीं चाहते हैं. और जो ऐसा करना चाहते हैं वो सशक्त नहीं है.”

ज़ैंग ने कहा भारत में फ़ेसबुक पर नफ़रत और फ़ेक न्यूज़ को रोकने में अगर मेटा नाकाम रहा तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. “भारतीय लोकतंत्र के विनाश में अगर फ़ेसबुक अहम भूमिका निभाएगा तो न केवल इसका भारत और अमेरिका के रिश्ते पर बुरा असर पड़ेगा, इससे अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय हितों का भी नुकसान होगा.”

ज़ैंग ने याद दिलाया कि कुछ साल पहले उन्होंने भारत में ऐसे फ़र्ज़ी फ़ेसबुक एकाउंट्स का पर्दाफ़ाश किया था जो नफ़रत फैलाते थे. लेकिन मेटा ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से इसलिए इंकार कर दिया था क्योंकि वो एकाउंट्स एक बीजेपी सांसद से जुड़े थे. जैसे ही ये बात सामने आई फ़ेसबुक के अधिकारियों ने ज़ैंग से इस बारे में बात करना ही बंद कर दिया.

ज़ैंग ने कहा “ऐसा लगा कि उन्होंने मेरे इर्द-गिर्द पत्थर की दीवार खड़ी कर दी है. फ़ेसबुक उन एकाउंट्स को बंद नहीं चाहता था क्योंकि वो एक महत्वपूर्ण सासंद से डरे हुए थे. फ़ेसबुक को लोकतंत्र बचाने की परवाह नहीं है. वो सिर्फ़ मुनाफ़ा देखता है. इसीलिए फ़ेसबुक सत्ताधारी पार्टी के सामने झुका रहता है.”

इस संसदीय ब्रीफ़िंग का आयोजन करने वाले संगठनों के नाम हैं जेनोसाइड वाच, वर्ल्ड विदाउट जेनोसाइड, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल, हिंदूज़ फ़ॉर ह्यूमन राइट्स, इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न, जुबली कैंपेन, 21विल्बरफ़ोर्स, दलित सॉलिडेरिटी फ़ोरम, न्यूयॉर्क स्टेट काउंसिल ऑफ़ चर्चेज़, फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन अमेरिकन क्रिश्चियन आर्गेनाइज़ेशंस ऑफ़ नॉर्थ अमेरिका, इंडिया सिविल वॉच इंटरनेशनल, सेंटर फ़ॉर प्लूरलिज़्म, इंटरनेशनल कमीशन फ़ॉर दलित राइट्स, अमेरिकन मुस्लिम इंस्टीट्यूशन, स्टूडेंट्स अगेन्स्ट हिंदुत्व आयडियोलॉजी, इंटरनेशनल सोसायटी फ़ॉर पीस एंड जस्टिस, द ह्युमनिज़्म प्रोजेक्ट, और एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन मुस्लिम्स ऑफ़ अमेरिका.

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